19/1/14

मन ही विभाजन है।



सजगता के साथ अनायास ही एक नई दृष्टि जन्म लेती है, जिसमें हम परिवेश और दुनिया को पहली बार यथार्थ में चीन्हने की शुरुवात करते हैं; जहाँ देखनेवाली आँख और दिखने वाली सचाई के बीच कोई भेद नहीं होता।

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